रात

रात

मेरे ‘रिलीवर’ के आते ही खत्म हुई मेरी ‘नाइट शिफ्ट’….आज भी अंधकार के छाते के नीचे दुनिया को देखा….दुनिया के कुछ लालटेनों बल्ब्स और ट्यूबलाइट्स को देखा…..
बनारस का जगिया बुनकर गंगा मैया को अपने दुखड़े सुना रहा था…
और उसकी बुनी साड़ी पहन हिरोइन का जलवा मुंबई के रैंप पर बिखर रहा था….
दतिया की रिम्पी बोर्ड की तैयारी में रात भर किताबों मे आंखें गढाए रही
तो दिल्ली में उसके भाई की नज़रें डिस्क में थिरकती बालाओं से न हटीं
नामी खानदान का छोटा भाई आज फिर सो न सका क्योंकि बड़े न जेट प्लेन खरीदा है
और रामप्रसाद की आंखों में नींद नहीं क्योंकि बहन की शादी का सामान न जुट सका है
बड़वई गांव का हरिया तो ‘पीपली लाइव’ की popularity मे गुम है
पर टीकमगढ़ का नत्था तो आज भी भूख से गुमसुम है
एक सुंदर लड़की ने छत पर लड़के से कहा देखो आज चांद कितना खूबसूरत है
मैंने चांद से कहा इतरा मत…मेरे अंधकार में ही तेरी चमक है
मैं न आती हर रात ‘टाइम’ पर तो कौन पूछता तुझे ?
जब मै ओढ़ती हूं काला शॉल तभी तो जग पूजता है तुझे….
मत भूल ओ अहंकारी मेरे जाते ही खत्म हो जाता है तू भी…
रहता तो यहीं है न, फिर चमकता क्यूं नहीं ???

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