अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस

8 मार्च को हम हर साल अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हैं..क्या आप जानते हैं कि 1913 में 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस घोषित किया गया था। यानि कि 2013 में महिला दिवस 100 साल पूरे कर रहा है…

हालांकि मैं किसी भी जश्न को एक दिन में बांधने में यकीन नहीं करती..मुझे नहीं लगता कि प्यार के इज़हार के लिए 14 फरवरी ही सही दिन है, या फिर मां से मिलने के लिए एक मदर्स डे के बहाने के ज़रूरत है, न ही महिला होने के जश्न के लिए 8 मार्च का इंतजा़र किया जाना चाहिए।

लेकिन चूंकि एक परंपरा सी बना दी गई है सो हम भी भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं और साल के एक दिन ही सही, अपने अस्तित्व पर फख्र करने की कोशिश कर लेते हैं। आज मैंने सोचा कि आप लोगों के साथ चंद ऐसी महिलाओं की कहानियां बांटूं जिन्होंने सही मायनों में कुछ न कुछ ऐसा किया जो हमें महिला होने का जश्न मनाने का मौका दे सके…जिन्होंने हर तरफ अंधेरे से घिरे हमारे रास्तों पर दिए रोशन किए…जिन्होंने हमें एक सीख दी कि अपनी ज़िंदगी का रिमोट सिर्फ और सिर्फ खुद के हाथ में होना चाहिए ना कि परिवार या समाज के हाथ में…

ऐसी ही कुछ महिलाओं को हमने इस साल के ज़िंदगी लाइव अवॉर्ड्स के लिए चुना। उनकी कहानियों ने लोगों को उनकी हिम्मत के सामने नत-मस्तक कर दिया। शुरूआत 2 ऐसी महिलाओं से जो उस माहौल में काम करती हैं जिसे आम तौर पर अच्छी नज़रों से नहीं देखा जाता। ये दो महिलाएं हैं किरण और ऐमी। दोनों अलग अलग तबकों की हैं, दोनों की परवरिश बहुत अलग है, अलग तरह की चुनौतियों से वो दोनों जूझती हैं..लेकिन दोनों का कर्म-क्षेत्र एक ही है..बार और डांस क्लब। ज़ाहिर है दोनों के ही काम को लोग उनके चरित्र से बड़ी आसानी से जोड़ देते होंगे।

किरण चंडीगढ़ के एक डांस क्लब में बाउंसर का काम करती हैं। बाउंसर का काम यानि रात की ड्यूटी करना, शराब के नशे में झूमते लोगों को संभालना, लड़कियों के साथ बदतमीज़ी होने से रोकना और इन जैसी तमाम ज़िम्मेदारियां। कद काठी से किरण किसी पहलवान से कम नहीं लगतीं लेकिन इसके बावजूद उन्हें महिला होने की कीमत कई बार चुकानी पड़ती है। कोई भी आते जाते उनसे कुछ भी कह जाता है सिर्फ इसलिए कि वो एक महिला हैं…और चूंकि वो रात की शिफ्ट करती हैं उनके चरित्र पर भी उंगली उठाने में लोग कोई कसर नहीं छोड़ते । लेकिन इस सबसे बेपरवाह किरण अपना काम करती हैं क्योंकि वो अपने बच्चों को एक बेहतर शिक्षा और उज्जवल भविष्य देना चाहती हैं। रात भर की ड्यूटी कर के वो घर लौटती हैं, अपने बच्चों को तैयार कर के स्कूल भेजती हैं, घर के सारे काम निपटाती हैं और फिर तैयार हो जाती हैं अगली रात की ड्यूटी के लिए…..

किरण की कही एक बात मेरे मन को छू गई थी। वो बोली थी- “मैडम लोग बहुत कुछ कहते हैं लेकिन मैं एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देती हूं..कोई मेरे घर में राशन नहीं डाल देगा। अपने बच्चों को मुझे ही पालना है” वाकई कितनी गहरी बात कही थी किरण ने। कितनी बार हम जाने अनजाने किसी भी महिला के चरित्र पर उंगली उठा देते हैं बिना उसके बारे में कुछ भी जाने समझे….

ऐमी एक बार-टेंडर हैं। उनका काम है बार में अलग अलग तरह के ड्रिंक्स बना कर लोगों के सामने पेश करना। वो देश की पहली महिला फ्लेयर बारटेंडर हैं। जब वो बोतलों को हवा में उछाल कर करतब दिखाती हैं तो देखने वालों के होश उड़ जाते हैं। लेकिन ऐमी को भी ये बात पता थी कि बार में काम करने की बात उनके परिवार वाले कभी स्वीकार नहीं कर पाएंगे । इसलिए शुरुआत में उन्होंने बिना किसी को बताए ही ये काम शुरू किया। आज वो इस क्षेत्र में एक जाना माना नाम हैं। ऐमी की जो बात मुझे सबसे अच्छी लगी वो है उनका आत्मविश्वास।

इन दोनों महिलाओं से मिल कर यही ख्याल आया कि हम और हमारा समाज कितनी आसानी से कुछ काम महिलाओं के लिए बैन कर देते हैं। और इसके लिए हम हर तरह के बहाने भी खोज लेते हैं। ये काम अच्छा नहीं, ये काम तुम्हारे लायक नहीं, इस काम में तुम्हारी सुरक्षा नहीं, ये माहौल तुम्हारे लिए ठीक नहीं, ये तुम्हारे बस की बात नहीं। और ऐसे न जाने कितने बहाने एक कैंची का काम करते हैं एक लड़की के पंख कतरने के लिए।

आज मुझे लगता है कि अगर वाकई हमें एक दिन को महिला दिवस के रूप में मनाना ही है तो क्यों न हर साल इस दिन हम तय करें कि अपनी बच्चियों के पंखों को उड़ान भरने देंगे, उन्हें हर काम के काबिल समझेंगे, उनको घर से न निकलने देने के बजाय सड़कों को उनके लिए सुरक्षित बनाएंगे, उनके लिए ऐसा माहौल तैयार करेंगे कि वो खुली हवा में सांस ले सकें, अपनी पसंद के रोज़गार चुन सकें, स्वाभिमान और आत्मविश्वास के साथ अपने पैरों पर खड़ी हो सकें और अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जी सकें

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